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लंगर बाबा का हुआ निधन, गरीबों का पेट भरने के लिए बेच दी थी अपनी 1.5 करोड़ रुपए की संपत्ति

आज हम आपको उस महान आदमी के बारें में बताने जा रहे है जिन्होंने हमारे समाज के लिए कही अचे काम किया था मगर अफ़सोस की वो अब इस दुनिया में नहीं है हम जिसकी बात कर रहे ही वो है ‘लंगर बाबा’ जो की अब हमारे बीच में नहीं हैं. यह बहुत वक़्त से गरीबों और भूखे लोगों के खाना किला रहे थे जब की इनकी उम्र 86 हो गई थी फिर भी यह अपनी जिमेदारी से पीछे नहीं हटते थे

चंडीगढ़ में सब इनको ‘लंगर बाबा’ के नाम से जानते थे इनको दो दशकों से भी ज़्यदा वक़्त हो गया था लंगर खिलते थे यह पीजीआईएमईआर और सेक्टर 32 में स्थित सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के बाहर गरीबों को मुफ्त भोजन खिलाते थे. जबसे इन्होने यह काम शुरू किया था तबसे कोई एक ऐसा दिन नहीं आया की इन्होने इस काम से छोटी ली हो यह अपना काम पुरे दिल से करते थे क्यों की लोग इतना इन्तज़ार करते थे यह रोज़ाना 2,500 लोगो को भोजन करवाते थे गरीबो की इतनी मदत करने वाले लंगर बाबा सब को छोड़ कर चले गए अब सवाल यह आता है की कौन आएगा उनकी जगह पर उनका असली नाम जगदीश लाल है यह काफी वक़्त से कैंसर की बीमारी से लड़ाई कर रहे थे मगर हाल ही में उनकी जान चली गई साल 2001 से यह अस्पताल के बाहर रोजाना इस लंगर खिलवाते थे

उन्होंने तो गरीबो के लिया अपनी 1.5 करोड़ रुपये की सम्पति रख दी थीं साल 2015में क्यों की वो नहीं चाहते थे की उनके पास कभी पैसे खत्म हो 2020 में उनको पद्मश्री पुरस्कार देकर सम्मानित भी करने वाले थे आपको बता दे की बंटवारे के बाद पाकिस्तान के पेशावर से भारत आए थे. जब यह 21 साल के थे तब वह फलों के व्यापार उसके बाद यह बहुत बड़े कारोबारी बन गए थे उनके दिमाग में ख्याल तब आया था जब उनके बेटे के आठवें जन्मदिन था जगदीश लाल ने कहा था कि मैंने ये फैसला किया कि मैं इस खास दिन पर बच्चों के लिए लंगर लागाऊंगा. जब मैंने बच्चों के चेहरे पर खुशी देखी, तो मुझे अपना बचपन याद आ गया. इस तरह मैंने फैसला किया कि मैं गरीबों के लिए लंगर लगाऊंगा.

उसके बाद से वो एक दिन भी नहीं रोके वो हर दिन लंगर का आयोजन करवाते थे गरीबो के लिए उनका यह ही कहना था की कोई गरीब भूखा नहीं सोना चाहिए हॉस्पिटल के भर बैठे गरीब उनका बहुत इंतज़ार करते थे लंगर में दाल, चपाती, चावल, हलवा और एक केला परोसा जाता था कैंसर के मरीजों को बाबा कही अलग अलग चीज़े देते थे खाने के लिए उनकी अंतिम इच्छा थी कि जो लंगर सेवा उन्होंने शुरू की वह उनकी मृत्यु के बाद भी जारी रहे. ऐसी सोच आज के वक़्त में बहुत कम लोगो की होती है

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